Salary of freshers stagnant in big IT companies
Salary of freshers stagnant in big IT companies: कौशल अंतर या आपूर्ति-मांग असंतुलन?
फ्रेशर्स की सैलरी में 10 वर्षों से नगण्य वृद्धि, जबकि टॉप एक्जीक्यूटिव्स की आय हुई दोगुनी
भारतीय आईटी सेक्टर में फ्रेशर्स की सैलरी पर हालिया रिपोर्ट्स चिंता जता रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक स्टडी के मुताबिक, पिछले एक दशक में बड़ी आईटी कंपनियों जैसे TCS, कॉग्निजेंट, और टेक महिंद्रा में फ्रेशर्स का औसत वार्षिक पैकेज 3-4 लाख रुपये (25,000–34,000 रुपये मासिक) के बीच ही अटका हुआ है, जबकि इसी अवधि में सी-सुइट एक्जीक्यूटिव्स की सैलरी मिलियन-डॉलर के स्तर तक पहुँच गई है।
GDP और आईटी निर्यात में वृद्धि, पर फ्रेशर्स के हिस्से में नहीं आया लाभ
देश की GDP 2.1 ट्रिलियन डॉलर (2014) से बढ़कर 4.2 ट्रिलियन डॉलर (2024) हो गई।
आईटी निर्यात 82 बिलियन डॉलर से 210 बिलियन डॉलर पर पहुँचा।
लेकिन फ्रेशर्स की सैलरी में वृद्धि दर महज 10-15% रही, जो महंगाई दर से भी कम है।
मेट्रो शहरों में खर्च बढ़ा, पर सैलरी नहीं
बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में किराया, भोजन और यातायात खर्च पिछले 10 वर्षों में 200% तक बढ़ गया है। ऐसे में फ्रेशर्स को रूम शेयरिंग या पार्ट-टाइम जॉब्स का सहारा लेना पड़ रहा है।
क्या हैं मुख्य कारण?
इंजीनियर्स की बढ़ती संख्या: हर साल 15 लाख+ इंजीनियरिंग ग्रेजुएट्स मार्केट में आ रहे हैं, जिससे आपूर्ति अधिक और मांग कम हो गई है।
कौशल अंतर: कंपनियों का दावा है कि 75% फ्रेशर्स इंडस्ट्री-रेडी स्किल्स से लैस नहीं होते, जिसके कारण उन्हें ट्रेनिंग पर खर्च करना पड़ता है।
ऑटोमेशन और लो-एंड प्रोजेक्ट्स में कमी: रूटीन कोडिंग जॉब्स अब AI/ऑटोमेशन से हो रही हैं, जिससे एंट्री-लेवल रोल्स की वैल्यू घटी है।
क्या है समाधान?
स्किल-अपग्रेड पर जोर: डेटा साइंस, AI और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे डोमेन में स्पेशलाइजेशन।
स्टार्टअप कल्चर को अपनाना: उच्च वेतन वाले अवसरों के लिए प्रोडक्ट-बेस्ड कंपनियों को टारगेट करना।
पॉलिसी लेवल पर हस्तक्षेप: सरकार और इंडस्ट्री को मिलकर मिनिमम फ्रेशर वेज स्टैंडर्ड्स तय करने की जरूरत।
विशेषज्ञों की राय
“फ्रेशर्स को सिर्फ डिग्री पर निर्भर न रहकर नए-युग के टेक स्किल्स सीखे