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सरकार IDBI Bank में सार्वजनिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ओएफएस रूट का सहारा ले सकती है

IDBI Bank

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नई दिल्ली, 22 मार्च 2026: केंद्र सरकार IDBI Bank में सार्वजनिक शेयरधारिता (पब्लिक फ्लोट) बढ़ाने के लिए ऑफर फॉर सेल (OFS) रूट का उपयोग करने पर विचार कर रही है। यह कदम उस असफल स्ट्रैटेजिक डिवेस्टमेंट के बाद उठाया जा रहा है, जिसमें सरकार और एलआईसी ने संयुक्त रूप से 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का प्रयास किया था।
वर्तमान में IDBI Bank में पब्लिक फ्लोट मात्र 5.29 प्रतिशत है, जो बैंक की उचित मूल्यांकन (फेयर वैल्यूएशन) में बड़ी बाधा बन रहा है। शेष हिस्सेदारी बीमा क्षेत्र की दिग्गज कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एलआईसी) के पास 49.24 प्रतिशत है, जबकि केंद्र सरकार (जीओआई) के पास 45.48 प्रतिशत है। यानी प्रमोटरों के पास कुल 94.72 प्रतिशत हिस्सेदारी है। सूत्रों ने बताया कि कम फ्री फ्लोट के कारण बाजार में पारदर्शी मूल्य निर्धारण संभव नहीं हो पा रहा है। अगर 10 या 15 प्रतिशत अतिरिक्त शेयर OFS के जरिए बेचे जाएं तो वैल्यूएशन अधिक विश्वसनीय बनेगी और भाव की खोज (प्राइस डिस्कवरी) पारदर्शी हो सकेगी। एक-दो चरणों के OFS के बाद स्ट्रैटेजिक सेल का रास्ता भी खुल सकता है।

यह विकास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी महीने की शुरुआत में 60.72 प्रतिशत बहुमत वाली हिस्सेदारी की बिक्री की प्रक्रिया रद्द कर दी गई थी। सरकार 30.48 प्रतिशत और एलआईसी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने वाली थी। दो संभावित खरीदारों — एमिरेट्स एनबीडी बैंक और प्रेम वत्सा समर्थित फेयरफैक्स इंडिया — के वित्तीय बिड रिजर्व प्राइस से काफी नीचे थे। सरकार का लक्ष्य इस सौदे से 70,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाने का था, लेकिन निवेशकों की कम रुचि और कम बिड के कारण यह असफल रहा। इस खबर के बाद आईडीबीआई बैंक के शेयरों में भारी गिरावट दर्ज की गई। पिछले एक महीने में शेयर लगभग 30 प्रतिशत टूट चुके हैं और 52-सप्ताह के निचले स्तर 69.90 रुपये के करीब पहुंच गए। 17 मार्च को एक दिन में ही 4.4 करोड़ से अधिक शेयरों का कारोबार हुआ, जो निवेशकों की बेचैनी को दर्शाता है।
आईडीबीआई बैंक का निजीकरण का सफर पुराना है। वर्ष 2016 के केंद्रीय बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पहली बार इसकी घोषणा की थी। पहला प्रयास मूल्यांकन विवाद के कारण फेल हो गया। इसके बाद 2019 में भारी एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) से जूझ रहे बैंक को बचाने के लिए एलआईसी ने 51 प्रतिशत नियंत्रक हिस्सेदारी 21,624 करोड़ रुपये में खरीदी। आरबीआई ने बैंक को निजी क्षेत्र का बैंक घोषित कर दिया। दिसंबर 2020 में एलआईसी की हिस्सेदारी 49.24 प्रतिशत रह जाने पर इसे सहयोगी कंपनी का दर्जा मिला। मई 2021 में कैबिनेट कमिटी ऑन इकोनॉमिक अफेयर्स ने स्ट्रैटेजिक डिसइन्वेस्टमेंट को मंजूरी दी। अक्टूबर 2022 में केपीएमजी को ट्रांजैक्शन एडवाइजर नियुक्त किया गया और 60.72 प्रतिशत बिक्री की मंशा घोषित हुई। ईओआई आमंत्रित किए गए। सेबी ने जनवरी 2023 में सरकार की बिक्री के बाद जीओआई को पब्लिक शेयरधारक के रूप में पुनर्वर्गीकरण की मंजूरी दी। अगस्त 2025 में एलआईसी के लिए भी यही मंजूरी मिली। फरवरी 2026 में अंतिम बिड आए, लेकिन असफल रहे।

OFS का विकल्प अब इसलिए चुना जा रहा है क्योंकि यह त्वरित और बाजार-अनुकूल तरीका है। इससे बैंक की लिक्विडिटी बढ़ेगी, छोटे निवेशक भाग ले सकेंगे और भविष्य में बड़े स्ट्रैटेजिक बायर के लिए बेहतर माहौल बनेगा। सरकार का कुल डिसइन्वेस्टमेंट लक्ष्य चालू वित्त वर्ष में 1.75 लाख करोड़ रुपये है, जिसमें आईडीबीआई बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार की स्थिति और भू-राजनीतिक कारकों के सुधरने तक रुकना भी एक विकल्प है।

IDBI Bank अब निजी क्षेत्र का बैंक है, लेकिन प्रमोटर हिस्सेदारी अधिक होने से शेयरधारकों की भागीदारी सीमित है। OFS से न केवल पब्लिक फ्लोट 25 प्रतिशत के नियामकीय स्तर की ओर बढ़ेगा (हालांकि बैंकिंग क्षेत्र में कुछ छूट है), बल्कि शेयर की तरलता बढ़ेगी। एलआईसी और सरकार दोनों को इससे फायदा होगा — एलआईसी अपनी बैलेंस शीट हल्की कर सकेगी और सरकार को राजस्व मिलेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम बैंकिंग क्षेत्र के निजीकरण की दिशा में सकारात्मक है। अगर OFS सफल रहा तो अन्य पीएसयू बैंकों के लिए भी मॉडल बनेगा। फिलहाल सेबी और आरबीआई की मंजूरी के साथ प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। आईडीबीआई बैंक के शेयरधारकों के लिए यह अच्छी खबर हो सकती है, क्योंकि बढ़ी हुई फ्लोट से मूल्यांकन में सुधार संभव है।
कुल मिलाकर, असफल स्ट्रैटेजिक सेल के बाद OFS सरकार की नई रणनीति है। यह न केवल आईडीबीआई बैंक को मजबूत बनाएगा बल्कि डिसइन्वेस्टमेंट लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करेगा। आगे के विकास पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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